मुहाल
ना जाने
क्या रोके है ख़ड़ा,
कि अपना हक़ माँगना
मुहाल हुआ।
पराये अपनों को
दिल से त्यागना
मुहाल हुआ।
मज़बूर होकर,
मजबूरन
मज़बूर न दिखना
मुहाल हुआ।
हँसते हैं तो
रोना आता है,
रोके हँसना
मुहाल हुआ।
मोहब्बत की…
और तमाशा बन गए,
दर्द में जीकर
दर्द-ए-दिल बयाँ करना
मुहाल हुआ।
जो चाहा
वो पा न सके,
पाया जब-जब कुछ,
उसे चाहना
मुहाल हुआ।
मौन है,
पर शांत नहीं,
हारकर भी
हार न मानना
मुहाल हुआ।
सौ दर्द सहकर भी,
खुद को बेक़ौफ़ कहकर भी,
इस बेदर्द ज़िंदगी से
बेक़ौफ़ लड़ना
मुहाल हुआ।
:) Khushi


Ebgrossing poetry
हारकर भी हार ना मानना मुहाल हुआ!