बातें
न ज़िंदगी करे कोई सवाल
न अब कोई और शोर चाहिए
इस बेहया सी ज़िंदगी में
मुफ़्त के दो पल चाहिए
धीमे चले
तो न दौड़ता समय चाहिए
पीछे मुड़े
तो न दुखता मन चाहिए
इस बेहया सी ज़िंदगी में
मुफ़्त के दो पल चाहिए
गिर कर उठे
तो रोना न पड़े
दिल से कहे
तो खोना न पड़े
आँखों का सच
लबों से बयान न करे
थके मन की बातें
कोई समझा न करे
सुलझ गए बहुत
अब उलझना नहीं
सुलझ गए बहुत
अब उलझना नहीं
बातें तो बातें हैं
बातों का भी क्या अब हिसाब चाहिए?
:) Khushi


बहुत उम्दा लिखा है, आपने!
So beautiful and relatable